कुनिहार:-
स्वर्गीय एल.आर. भारद्वाज की चतुर्थ पुण्यतिथि के अवसर पर उनकी धर्मपत्नी जानकी देवी, पुत्र पंकज भारद्वाज एवं समस्त भारद्वाज परिवार के सौजन्य से आयोजित श्रीमद्भागवत महापुराण कथा के सातवें दिन कथा व्यास आचार्य प्रेमदत्त जी महाराज ने भगवान श्रीकृष्ण और माता रुक्मिणी के दिव्य विवाह प्रसंग का भावपूर्ण वर्णन किया। कथा सुनने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु पंडाल में उपस्थित रहे और पूरा वातावरण भक्ति रस में सराबोर रहा।
कथाव्यास ने कहा कि रुक्मिणी विवाह का प्रसंग केवल भगवान श्रीकृष्ण के विवाह का वर्णन नहीं है, बल्कि यह जीवात्मा के परमात्मा के प्रति अटूट प्रेम, श्रद्धा और पूर्ण समर्पण का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि जो भक्त निष्काम भाव से भगवान का स्मरण करता है, प्रभु स्वयं उसकी रक्षा और कल्याण के लिए उपस्थित होते हैं।
उन्होंने बताया कि विदर्भ नरेश राजा भीष्मक की पुत्री रुक्मिणी बचपन से ही भगवान श्रीकृष्ण के गुणों का श्रवण करती थीं। भगवान के दिव्य स्वरूप और चरित्र से प्रभावित होकर उन्होंने मन ही मन श्रीकृष्ण को अपना पति स्वीकार कर लिया था। दूसरी ओर उनके भाई रुक्मी ने राजनीतिक कारणों से उनका विवाह चेदिराज शिशुपाल से तय कर दिया। इस संकट की घड़ी में रुक्मिणी ने एक ब्राह्मण के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण को संदेश भेजकर उन्हें अपने उद्धार के लिए बुलाया।
कथाव्यास ने कहा कि भक्त की पुकार सुनते ही भगवान श्रीकृष्ण द्वारका से विदर्भ पहुंचे। माता गिरिजा के मंदिर में पूजा-अर्चना के बाद जैसे ही रुक्मिणी बाहर निकलीं, भगवान श्रीकृष्ण उन्हें अपने रथ पर बैठाकर ले गए। शिशुपाल, जरासंध और अन्य राजाओं ने उनका पीछा किया, लेकिन भगवान के पराक्रम के सामने सभी पराजित हो गए। रुक्मी ने भी युद्ध किया, किंतु उसे भी पराजय का सामना करना पड़ा। इसके बाद द्वारका में वैदिक रीति-रिवाजों के साथ भगवान श्रीकृष्ण और माता रुक्मिणी का दिव्य विवाह संपन्न हुआ तथा देवताओं ने पुष्पवर्षा कर इस मंगल अवसर का स्वागत किया।
आचार्य प्रेमदत्त जी महाराज ने कहा कि रुक्मिणी की अटूट श्रद्धा, धैर्य और भगवान के प्रति पूर्ण विश्वास प्रत्येक भक्त के लिए प्रेरणा है। उन्होंने कहा कि जीवन में अहंकार, लोभ और मोह का त्याग कर सत्य, सेवा, प्रेम और भक्ति के मार्ग पर चलने वाला व्यक्ति ही ईश्वर की कृपा का पात्र बनता है। भगवान कभी भी अपने सच्चे भक्त का साथ नहीं छोड़ते।
कथा के उपरांत भगवान श्रीकृष्ण और माता रुक्मिणी के दिव्य विवाह की झांकी सजाई गई तथा श्रद्धालुओं ने भक्ति-भाव से मंगल आरती में भाग लिया। पूरा कथा पंडाल “राधे-कृष्ण”, “जय श्रीकृष्ण” और “रुक्मिणी वल्लभ भगवान की जय” के जयघोष से गुंजायमान हो उठा। अंत में श्रद्धालुओं को प्रसाद वितरित किया गया। आयोजक परिवार ने कथा में पधारे सभी श्रद्धालुओं का आभार व्यक्त करते हुए धर्म और संस्कृति के संरक्षण के लिए ऐसे आयोजनों में बढ़-चढ़कर भाग लेने का आह्वान किया।






