कुनिहार
प्राचीन ठाकुरद्वारा मंदिर हाटकोट कुनिहार में कृष्ण जन्माष्टमी के उपलक्ष्य में श्रीरामलीला जनकल्याण समिति के तत्वावधान में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के दूसरे दिन कथा व्यास अरुणानंद आनंद ने राजा परीक्षित शुकदेव महाराज और पांडवों से जुड़े प्रसंग सुनाए। कथा व्यास ने कहा कि मनुष्य को जीवन के अंतिम समय में सांसारिक मोह माया छोड़कर भगवान का स्मरण नाम संकीर्तन और कथा श्रवण करना चाहिए। उन्होंने बताया कि राजा परीक्षित को जब ज्ञात हुआ कि सात दिन बाद तक्षक नाग के दंश से उनकी मृत्यु होगी। तो उन्होंने राजपाट और सांसारिक मोह का
त्याग कर गंगा तट पर बैठकर भगवान की कथा सुनने का संकल्प लिया। उन्होंने शुकदेव महाराज से पूछा कि मृत्यु के समय मनुष्य को क्या करना चाहिए और किसका स्मरण करना चाहिए। शुकदेव ने उन्हें भगवान के नाम भक्ति और कथा श्रवण का महत्व बताया।
अरुणानंद आनंद ने कहा कि मृत्यु के समय धन संपत्ति परिवार और सांसारिक वस्तुएं मनुष्य के साथ नहीं जातीं। भगवान का नाम और भक्ति ही जीवन की वास्तविक पूंजी है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को जीवन रहते ही प्रभु का स्मरण करने की आदत डालनी चाहिए।
कथा के दौरान पांडवों के जीवन से जुड़े प्रसंग सुनाते हुए उन्होंने कहा कि पांडवों ने अनेक कठिनाइयों का सामना किया। लेकिन भगवान श्रीकृष्ण पर उनका विश्वास कभी कम नहीं हुआ। वनवास और अज्ञातवास से लेकर महाभारत के युद्ध तक भगवान श्रीकृष्ण ने उनका मार्गदर्शन किया।
द्रौपदी चीरहरण प्रसंग का वर्णन करते हुए कथा व्यास ने कहा कि जब द्रौपदी ने सभी ओर से निराश होकर भगवान श्रीकृष्ण को पुकारा तो प्रभु ने उसकी लाज की रक्षा की। महाभारत युद्ध में श्रीकृष्ण अर्जुन के सारथी बने और उन्हें श्रीमद्भगवद्गीता का उपदेश देकर धर्म और कर्तव्य का मार्ग दिखाया।उन्होंने श्रद्धालुओं से कहा कि जीवन में कितनी भी विपरीत परिस्थितियां आएं। भगवान पर विश्वास नहीं छोड़ना चाहिए। सच्चे मन से की गई प्रार्थना और भक्ति कभी व्यर्थ नहीं जाती। कथा के दौरान भगवान श्रीकृष्ण के जयकारों से मंदिर परिसर भक्तिमय हो उठा।






