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बनलगी की40 लाख की सब्जी मंडी बनी खंडहर, किसानों को नहीं मिल रहा लाभ, नशेड़ियों का अड्डा बना सरकारी भवन

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कुठाड़ , पवन सिंघ

दून विधानसभा क्षेत्र की दाड़वा पंचायत के बनलगी चौक में वर्ष 2002 में लगभग 40 लाख रुपये की लागत से निर्मित फल एवं सब्जी उपमंडी आज अपनी बदहाली पर आंसू बहा रही है। किसानों की सुविधा और कृषि उत्पादों के बेहतर विपणन के उद्देश्य से बनाई गई यह मंडी पिछले कई वर्षों से बंद पड़ी है। हालत यह है कि भवन में ताले लटके हुए हैं और परिसर नशेड़ियों, असामाजिक तत्वों तथा प्रवासियों का अड्डा बनकर रह गया है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि करोड़ों रुपये की सरकारी संपत्तियों की सुरक्षा और उपयोग सुनिश्चित करने का दावा करने वाले विभागों ने इस मंडी की वर्षों से कोई सुध नहीं ली। मंडी परिसर में झाड़ियां उग चुकी हैं, सुरक्षा दीवारों और पैरापीट के पत्थर तक चोरी हो चुके हैं, लेकिन जिम्मेदार विभाग अब तक मौन हैं। ग्रामीणों का कहना है कि पूर्व मुख्यमंत्री प्रो. प्रेम कुमार धूमल के कार्यकाल में शुरू हुई यह मंडी क्षेत्र की एक दर्जन पंचायतों के किसानों के लिए वरदान साबित हुई थी। शुरुआती वर्षों में यहां फल और सब्जियों का अच्छा कारोबार होता था, जिससे किसानों को अपने उत्पाद बेचने के लिए चंडीगढ़ और अन्य दूरस्थ मंडियों में नहीं जाना पड़ता था। लेकिन विभागीय उदासीनता के चलते यह व्यवस्था धीरे-धीरे पूरी तरह ठप हो गई।
ग्राम पंचायत कृष्णगढ़ के प्रधान पुष्पेंद्र कुमार, दाड़वा पंचायत की प्रधान किरण बाला, पूर्व उपप्रधान हीरालाल सहित अनेक किसानों ने सवाल उठाया है कि आखिर वर्षों से बंद पड़ी इस मंडी का कभी निरीक्षण क्यों नहीं किया गया? किसानों और आढ़तियों के साथ बैठक कर इसे पुनः शुरू करने की कोई पहल क्यों नहीं की गई? स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि मंडी को दोबारा संचालित नहीं किया जा सकता तो सरकार इस भवन का उपयोग गेस्ट हाउस, कृषि प्रसंस्करण केंद्र, प्रशिक्षण संस्थान अथवा फल विधायन केंद्र के रूप में करे, ताकि सरकारी धन से निर्मित यह भवन जनहित में उपयोग हो सके। ग्रामीणों ने मार्केटिंग बोर्ड सोलन, जिला प्रशासन और प्रदेश सरकार से मांग की है कि बंद पड़ी इस मंडी की तत्काल जांच करवाई जाए, जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाए तथा किसानों के हित में इसे दोबारा शुरू करने के लिए ठोस कदम उठाए जाएं। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि समय रहते इस ओर ध्यान नहीं दिया गया तो लाखों रुपये की यह सरकारी संपत्ति पूरी तरह खंडहर में तब्दील हो जाएगी, जिसकी जिम्मेदारी संबंधित विभागों और अधिकारियों पर होगी।

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