रामशहर पवन सिंघ
कारगिल विजय दिवस पर पूरा देश अपने वीर शहीदों को श्रद्धापूर्वक नमन कर रहा है, लेकिन नालागढ़ उपमंडल के जोगटी पंदल गांव के शहीद राइफलमैन प्रदीप कुमार कौशल के परिवार की पीड़ा आज भी कम नहीं हुई है। देश के लिए सर्वोच्च बलिदान देने वाले इस वीर सपूत के नाम पर दिग्गल में 5 अप्रैल 2001 को शुरू किया गया विश्राम गृह 25 वर्षों बाद भी पूरा नहीं हो पाया है। शहीद के पिता, सेवानिवृत्त नायब सूबेदार जगन्नाथ कौशल कहते हैं कि जब स्वास्थ्य ठीक था, तब उन्होंने इस विश्राम गृह को पूरा करवाने के लिए बहुत प्रयास किए, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। अब उम्र और बीमारी के कारण उन्होंने मांग करना भी लगभग छोड़ दिया है। जगन्नाथ कौशल बताते हैं कि विश्राम गृह को चार मंजिला बनाया जाना था, लेकिन धन की कमी और प्रशासनिक उदासीनता के चलते आज तक केवल तीन मंजिलों का ही निर्माण हो पाया है। यही नहीं, जिस गांव ने देश को अपना वीर सपूत दिया, वहां तक पहुंचने वाली लगभग तीन किलोमीटर लंबी सड़क को पक्का करवाने के लिए भी उन्हें करीब 20 वर्षों तक संघर्ष करना पड़ा। शुरुआत में उन्होंने अपने बेटे की स्मृति में अपनी जेब से लगभग तीन लाख रुपये खर्च कर सड़क बनवाई थी, जिसके बाद वर्षों बाद सरकार ने उसे पक्का किया। 9 जुलाई 1999 को कारगिल युद्ध की माशकोह घाटी में 23 वर्षीय प्रदीप कौशल मातृभूमि की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए थे। बेटे की शहादत का दुख परिवार अभी तक भुला नहीं पाया था कि वर्ष 2018 में बीमारी के कारण उनके दूसरे बेटे का भी निधन हो गया। दो बेटों को खोने का दर्द आज भी जगन्नाथ कौशल और उनकी पत्नी रामेश्वरी देवी के चेहरे पर साफ दिखाई देता है, लेकिन उन्हें इस बात का गर्व है कि उनके बेटे ने देश के लिए अपने प्राण न्यौछावर किए।कारगिल युद्ध के दौरान प्रदीप कौशल ने अपने पिता को अंतिम बार फोन किया था। उन्होंने बताया था कि जिस उद्देश्य से वह सेना में भर्ती हुए थे, अब उसी कर्तव्य का निर्वहन कर रहे हैं। चारों ओर गोलाबारी हो रही है और हालात ऐसे हैं कि उनका लौटना मुश्किल है। बातचीत के अंत में उन्होंने अपने पिता से कहा था, “आप तो फौजी आदमी हैं, सब सहन कर लेंगे, लेकिन मेरी मां यह सदमा सहन नहीं कर पाएगी, उसका ख्याल रखना।” बेटे के ये अंतिम शब्द आज भी परिवार की आंखें नम कर देते हैं।
शहीद प्रदीप कौशल की स्मृति को अमर बनाने के लिए क्षेत्र में कई विकास कार्य किए गए हैं। बदोखर स्कूल को उनके नाम से जोड़ा गया, एक सड़क का नामकरण उनके नाम पर किया गया, रामशहर में उनके नाम से भारत गैस एजेंसी संचालित की जा रही है और बदोखर में उनके नाम पर एक डिस्पेंसरी भी स्थापित की गई है। स्थानीय लोगों का कहना है कि जब शहीद का पार्थिव शरीर गांव पहुंचा था, तब नालागढ़ से रामशहर तक हजारों लोग सड़कों के किनारे खड़े होकर अपने वीर सपूत को अंतिम विदाई देने पहुंचे थे। पूरा क्षेत्र भारत माता के जयघोष और देशभक्ति के नारों से गूंज उठा था। कारगिल विजय दिवस के अवसर पर जगन्नाथ कौशल ने भावुक स्वर में कहा कि स्वास्थ्य ठीक नहीं है, लेकिन वह अपने बेटे की स्मृति में आयोजित कार्यक्रम में अवश्य शामिल होंगे। वहीं क्षेत्र के लोगों का कहना है कि शहीद प्रदीप कौशल केवल एक नाम नहीं, बल्कि साहस, देशभक्ति और बलिदान की ऐसी मिसाल हैं, जो आने वाली पीढ़ियों को सदैव प्रेरित करती रहेगी। हालांकि आज भी एक सवाल
लोगों के मन में है कि जिस वीर सपूत ने देश के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया, उसके नाम पर शुरू किया गया विश्राम गृह आखिर 25 वर्षों बाद भी अधूरा क्यों है।






